‘ रामायण’ नहीं ‘रोटियां’ चाहिए

By Nabeela Shagufi

कहते हैं ‘जब रोम जल रहा था तो नीरो बांसुरी बजा रहा था’। दुर्भाग्य से आज भारत भी उसी हाल में है। देश के कई हिस्सों से ऐसी खबरें आ रही हैं कि खाने के अभाव में मजदूर शहर छोड़कर रिक्शा और ठेलों से गांवों का रूख कर रहे हैं। बीबीसी के एक खबर के मुताबिक शहर छोड़कर गांव जा रहे कुछ मजदूरों की सड़क हादसे में मौत हो गई।

इस परिस्थिति में प्रकाश जावड़ेकर ने रामायण देखते हुए अपनी फोटो ट्विट की थी। रामायण के पुनः प्रसारण के पीछे बस मध्यम वर्ग को ही ध्यान में रखा गया है। सरकार के एजेंडे में निम्न वर्ग को कभी केंद्र में रखा ही नहीं गया। निम्न वर्ग तो रोटी के लिए अपनी जान पर खेलकर सड़कों पर निकल रहा है और पुलिस के डंडे खा रहा है। ‘रामायण’ के प्रसारण से किसी मजदूर का पेट नहीं भरा जा सकता और न ही किसी भूखे इंसान के लिए ये महत्व रखता है। अनियोजित तरीके से लागू किए गए इस लाॅकडाउन में उच्च और मध्यम वर्ग सोशल मीडिया और रामायण के सहारे अपने 21 दिन गुजार सकते हैं, उन्हें खाना के लाले नहीं पड़ने वाले हैं।
वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री ने जितने भी पैकेज का ऐलान किया हो वो तत्काल प्रभाव में नहीं हैं। अगर वक्त रहते इसकी योजना बनाई जाती तो इस तरह से अफरा-तफरी का माहौल नहीं होता। लोगों को तीन-तीन दिन भूखों रहने की नौबत नहीं आ पाती। 21 दिन के इस अनियोजित लाॅकडाउन की भरपाई सबसे ज्यादा निम्न वर्ग के लोग ही करेंगे।

जब चीन कोरोना से जूझ रहा था तो पूरी संभावनाएं थीं कि ये भारत में भी तबाही मचा सकता है पर उस समय किसी तरह की कोई तैयारी नहीं की गई। एयरपोर्ट पर भी निरीक्षण को लेकर कोई सख्ती नहीं की गई। जबकि प्रधानमंत्री हुनर हाट में लिट्टी चोखा का आनंद ले रहे थे और अमित शाह सीएए को लेकर रैलियां कर रहे थे।

चाहे दिल्ली में हो रहे दंगे हों या कोरोना की मार झेल रहा देश हो, गृहमंत्री जी हमेशा चुप्पी साधे रखते हैं। उनकी चुस्ती तभी देखी जा सकती है, जब किसी कानून को लेकर रैलियां करनी हों या किसी राज्य में सरकार बनानी हो।
देश की जनता ने देश की बागडोर ऐसे लोगों के हाथों में थमा दी है जिनके एजेंडे में निम्न वर्ग हमेशा हाशिए पर रहता है। प्रधानमंत्री जी ने लोगों से थालियां बजाने के पीछे चाहे जो भी उद्देश्य सामने रखे हों पर ये इस बात का भी संकेत है कि ये थालियां बस बजाने के काम में लाई जानी चाहिए क्योंकि हमारी सरकार इनमें रोटी मुहैया कराने में नाकाम है।

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