वैश्यवृति या फिर मजबूरी: ना जाने ऐसी कितनी रजिया होंगी जिनके जिस्म हमारा समाज हर रोज नोचता होगा???

सूर्यास्त होते ही ज़िन्दगी बदल जाती है. कहीं लोगों को अपने काम से घर भागने की जल्दी होती है तो कहीं अपने काम में पड़ने की, परिंदे भी शाम होते अपने घोसले में चल देते हैं. दुनियां अंधेरों में लिपट जाती है आकाश तारों से सुशोभित हो उठता है. आपने एक गीत सुना ही होगा “सो गई है ज़मी,सो गया आसमाँ मग़र हम मिले मुझे याद रखना” मग़र यहाँ याद रखने वाली बात नहीं है. यहाँ रातों में चलते -फिरते मिलने वाली बात है.

शाम होते ही जहाँ बाजारें समेटी जाती है वहीं दूसरी बाजार भी लगती है. जिसे हुस्न की बाज़ार कहते हैं. लोग अपनी प्यास, कामवासना,झुंझलाहट, परेशानी, फ्रस्टेशन, मिटाने के लिए आते -जाते हैं. जहाँ एक तरफ सुख, आनंद की अनुभूति होती है वहीं दूसरी तरफ तृप्ति ,दुःख दर्द, मजबूरी है. मग़र कभी कोई जानने की कोशिश भी नहीं करता की आख़िर वह किस संवेदना से गुजर रही है. पैसा देकर कुछ देर उस ख़ज़ाने की मालिक समझ बैठते हैं और उसका भरपूर उपयोग करते है, न फोकट का माल रहती और नाहि फोकट का पैसा. मुझे एक लंगड़े की याद आ रही है नाम ‘अब्बास मियां’. अब्बास पेशे से तो भिखारी था मग़र था दिलदार, एक दिन रज़िया नीम के पेड़ के नीचे किसी कारण वश रो रही थी तभी उस पर अब्बास की नज़र पड़ी और उसने अपने वील चेयर पर बैठे- बैठे 50 टका निकालकर दे दिया. रज़िया के जीवन में पहली बार ऐसा हुआ कि किसी ने उसे बिना छुए पैसा दिया. रज़िया उसे गिद्ध रूपी मानव में दुनिया का सबसे अच्छा इंसान समझी फिर दोनों में बातें होने लगी अब्बास मियां की पत्नी अपाहिज़ होने के कारण उसे छोड़ दी थी , और वहीं रज़िया बचपन में ही वैश्या बन गई थी.

शाम होते ही जहाँ बाजारें समेटी जाती है वहीं दूसरी बाजार भी लगती है. जिसे हुस्न की बाज़ार कहते हैं. लोग अपनी प्यास, कामवासना,झुंझलाहट, परेशानी, फ्रस्टेशन, मिटाने के लिए आते -जाते हैं. जहाँ एक तरफ सुख, आनंद की अनुभूति होती है वहीं दूसरी तरफ तृप्ति ,दुःख दर्द, मजबूरी है. मग़र कभी कोई जानने की कोशिश भी नहीं करता की आख़िर वह किस संवेदना से गुजर रही है. पैसा देकर कुछ देर उस ख़ज़ाने की मालिक समझ बैठते हैं और उसका भरपूर उपयोग करते है, न फोकट का माल रहती और नाहि फोकट का पैसा. मुझे एक लंगड़े की याद आ रही है नाम ‘अब्बास मियां’. अब्बास पेशे से तो भिखारी था मग़र था दिलदार, एक दिन रज़िया नीम के पेड़ के नीचे किसी कारण वश रो रही थी तभी उस पर अब्बास की नज़र पड़ी और उसने अपने वील चेयर पर बैठे- बैठे 50 टका निकालकर दे दिया. रज़िया के जीवन में पहली बार ऐसा हुआ कि किसी ने उसे बिना छुए पैसा दिया. रज़िया उसे गिद्ध रूपी मानव में दुनिया का सबसे अच्छा इंसान समझी फिर दोनों में बातें होने लगी अब्बास मियां की पत्नी अपाहिज़ होने के कारण उसे छोड़ दी थी , और वहीं रज़िया बचपन में ही वैश्या बन गई थी.शाम होते ही जहाँ बाजारें समेटी जाती है वहीं दूसरी बाजार भी लगती है. जिसे हुस्न की बाज़ार कहते हैं. लोग अपनी प्यास, कामवासना,झुंझलाहट, परेशानी, फ्रस्टेशन, मिटाने के लिए आते -जाते हैं. जहाँ एक तरफ सुख, आनंद की अनुभूति होती है वहीं दूसरी तरफ तृप्ति ,दुःख दर्द, मजबूरी है. मग़र कभी कोई जानने की कोशिश भी नहीं करता की आख़िर वह किस संवेदना से गुजर रही है. पैसा देकर कुछ देर उस ख़ज़ाने की मालिक समझ बैठते हैं और उसका भरपूर उपयोग करते है, न फोकट का माल रहती और नाहि फोकट का पैसा. मुझे एक लंगड़े की याद आ रही है नाम ‘अब्बास मियां’. अब्बास पेशे से तो भिखारी था मग़र था दिलदार, एक दिन रज़िया नीम के पेड़ के नीचे किसी कारण वश रो रही थी तभी उस पर अब्बास की नज़र पड़ी और उसने अपने वील चेयर पर बैठे- बैठे 50 टका निकालकर दे दिया. रज़िया के जीवन में पहली बार ऐसा हुआ कि किसी ने उसे बिना छुए पैसा दिया. रज़िया उसे गिद्ध रूपी मानव में दुनिया का सबसे अच्छा इंसान समझी फिर दोनों में बातें होने लगी अब्बास मियां की पत्नी अपाहिज़ होने के कारण उसे छोड़ दी थी , और वहीं रज़िया बचपन में ही वैश्या बन गई थी.शाम होते ही जहाँ बाजारें समेटी जाती है वहीं दूसरी बाजार भी लगती है. जिसे हुस्न की बाज़ार कहते हैं. लोग अपनी प्यास, कामवासना,झुंझलाहट, परेशानी, फ्रस्टेशन, मिटाने के लिए आते -जाते हैं. जहाँ एक तरफ सुख, आनंद की अनुभूति होती है वहीं दूसरी तरफ तृप्ति ,दुःख दर्द, मजबूरी है. मग़र कभी कोई जानने की कोशिश भी नहीं करता की आख़िर वह किस संवेदना से गुजर रही है. पैसा देकर कुछ देर उस ख़ज़ाने की मालिक समझ बैठते हैं और उसका भरपूर उपयोग करते है, न फोकट का माल रहती और नाहि फोकट का पैसा. मुझे एक लंगड़े की याद आ रही है नाम ‘अब्बास मियां’. अब्बास पेशे से तो भिखारी था मग़र था दिलदार, एक दिन रज़िया नीम के पेड़ के नीचे किसी कारण वश रो रही थी तभी उस पर अब्बास की नज़र पड़ी और उसने अपने वील चेयर पर बैठे- बैठे 50 टका निकालकर दे दिया. रज़िया के जीवन में पहली बार ऐसा हुआ कि किसी ने उसे बिना छुए पैसा दिया. रज़िया उसे गिद्ध रूपी मानव में दुनिया का सबसे अच्छा इंसान समझी फिर दोनों में बातें होने लगी अब्बास मियां की पत्नी अपाहिज़ होने के कारण उसे छोड़ दी थी , और वहीं रज़िया बचपन में ही वैश्या बन गई थी.शाम होते ही जहाँ बाजारें समेटी जाती है वहीं दूसरी बाजार भी लगती है. जिसे हुस्न की बाज़ार कहते हैं. लोग अपनी प्यास, कामवासना,झुंझलाहट, परेशानी, फ्रस्टेशन, मिटाने के लिए आते -जाते हैं. जहाँ एक तरफ सुख, आनंद की अनुभूति होती है वहीं दूसरी तरफ तृप्ति ,दुःख दर्द, मजबूरी है. मग़र कभी कोई जानने की कोशिश भी नहीं करता की आख़िर वह किस संवेदना से गुजर रही है. पैसा देकर कुछ देर उस ख़ज़ाने की मालिक समझ बैठते हैं और उसका भरपूर उपयोग करते है, न फोकट का माल रहती और नाहि फोकट का पैसा. मुझे एक लंगड़े की याद आ रही है नाम ‘अब्बास मियां’. अब्बास पेशे से तो भिखारी था मग़र था दिलदार, एक दिन रज़िया नीम के पेड़ के नीचे किसी कारण वश रो रही थी तभी उस पर अब्बास की नज़र पड़ी और उसने अपने वील चेयर पर बैठे- बैठे 50 टका निकालकर दे दिया. रज़िया के जीवन में पहली बार ऐसा हुआ कि किसी ने उसे बिना छुए पैसा दिया. रज़िया उसे गिद्ध रूपी मानव में दुनिया का सबसे अच्छा इंसान समझी फिर दोनों में बातें होने लगी अब्बास मियां की पत्नी अपाहिज़ होने के कारण उसे छोड़ दी थी , और वहीं रज़िया बचपन में ही वैश्या बन गई थी.

रज़िया के जीवन में यह पहला मौक़ा था जब किसी ने बिना उसे छुए पैसा भी दिया और उसका हाल जानने की कोशिश की ये तो कहानियों की बात है महाराज. असल जिंदगी में तो सिर्फ और सिर्फ कोरी कल्पना है. भला यदि कुबेर का खज़ाना हो और देवी लक्ष्मी की कृपा हो तो वह मनुष्य बेशौक क्यों मरे? कतई नहीं हो सकता. सिक्कों की खनक और घुँघरू की झंकार का आपसी पुराना याराना है. पैसे और शौक़ के आगे इंसान कठपुतली हो जाता हैं. इसका यथार्थ उदाहरण हम अपने आस पास देख सकते है.

ये दिल्ली की सड़कों की आम बात है कि सूरज ढलते ही वैश्यावृति में लिप्त स्त्रियां सड़को पर ग्राहक की खोज में जुट जाती हैं. यह अत्यंत खेदनिय है कि कम उम्र की लड़कियां भी शामिल रहती हैं और यह दिल्ली के लिए ये आम बात नहीं है. बल्कि दिल्ली में ही एक ऐसी जगह भी है जहां पर इस धंधे को शायद आधिकारिक रूप भी प्रदान है. लेकिन इसके परे भी छिटपुट धंधे चलते रहते है. सड़क किनारे खड़ी औरतों से पहले बकायदा सौदा माफ़िक मोलजोल होती है. फिर एक दाम पर सहमति बनती है. ये इकीसवीं सदी है. लोग यहाँ भिखारी को भी बिना गरियाये पैसा नहीं देते. भला गोश्त की मोटरी हो और उसे मुफ्त का पैसा दे. एक अधेड़ व्यक्ति भी किसी कम उम्र की लड़की की चाहत रखता है जिसे आधुनिकता और नशे में चूर कमसीन कली कहता है.

ये दिल्ली की सड़कों की आम बात है कि सूरज ढलते ही वैश्यावृति में लिप्त स्त्रियां सड़को पर ग्राहक की खोज में जुट जाती हैं. यह अत्यंत खेदनिय है कि कम उम्र की लड़कियां भी शामिल रहती हैं और यह दिल्ली के लिए ये आम बात नहीं है. बल्कि दिल्ली में ही एक ऐसी जगह भी है जहां पर इस धंधे को शायद आधिकारिक रूप भी प्रदान है. लेकिन इसके परे भी छिटपुट धंधे चलते रहते है. सड़क किनारे खड़ी औरतों से पहले बकायदा सौदा माफ़िक मोलजोल होती है. फिर एक दाम पर सहमति बनती है. ये इकीसवीं सदी है. लोग यहाँ भिखारी को भी बिना गरियाये पैसा नहीं देते. भला गोश्त की मोटरी हो और उसे मुफ्त का पैसा दे. एक अधेड़ व्यक्ति भी किसी कम उम्र की लड़की की चाहत रखता है जिसे आधुनिकता और नशे में चूर कमसीन कली कहता है.ये दिल्ली की सड़कों की आम बात है कि सूरज ढलते ही वैश्यावृति में लिप्त स्त्रियां सड़को पर ग्राहक की खोज में जुट जाती हैं. यह अत्यंत खेदनिय है कि कम उम्र की लड़कियां भी शामिल रहती हैं और यह दिल्ली के लिए ये आम बात नहीं है. बल्कि दिल्ली में ही एक ऐसी जगह भी है जहां पर इस धंधे को शायद आधिकारिक रूप भी प्रदान है. लेकिन इसके परे भी छिटपुट धंधे चलते रहते है. सड़क किनारे खड़ी औरतों से पहले बकायदा सौदा माफ़िक मोलजोल होती है. फिर एक दाम पर सहमति बनती है. ये इकीसवीं सदी है. लोग यहाँ भिखारी को भी बिना गरियाये पैसा नहीं देते. भला गोश्त की मोटरी हो और उसे मुफ्त का पैसा दे. एक अधेड़ व्यक्ति भी किसी कम उम्र की लड़की की चाहत रखता है जिसे आधुनिकता और नशे में चूर कमसीन कली कहता है.ये दिल्ली की सड़कों की आम बात है कि सूरज ढलते ही वैश्यावृति में लिप्त स्त्रियां सड़को पर ग्राहक की खोज में जुट जाती हैं. यह अत्यंत खेदनिय है कि कम उम्र की लड़कियां भी शामिल रहती हैं और यह दिल्ली के लिए ये आम बात नहीं है. बल्कि दिल्ली में ही एक ऐसी जगह भी है जहां पर इस धंधे को शायद आधिकारिक रूप भी प्रदान है. लेकिन इसके परे भी छिटपुट धंधे चलते रहते है. सड़क किनारे खड़ी औरतों से पहले बकायदा सौदा माफ़िक मोलजोल होती है. फिर एक दाम पर सहमति बनती है. ये इकीसवीं सदी है. लोग यहाँ भिखारी को भी बिना गरियाये पैसा नहीं देते. भला गोश्त की मोटरी हो और उसे मुफ्त का पैसा दे. एक अधेड़ व्यक्ति भी किसी कम उम्र की लड़की की चाहत रखता है जिसे आधुनिकता और नशे में चूर कमसीन कली कहता है.ये दिल्ली की सड़कों की आम बात है कि सूरज ढलते ही वैश्यावृति में लिप्त स्त्रियां सड़को पर ग्राहक की खोज में जुट जाती हैं. यह अत्यंत खेदनिय है कि कम उम्र की लड़कियां भी शामिल रहती हैं और यह दिल्ली के लिए ये आम बात नहीं है. बल्कि दिल्ली में ही एक ऐसी जगह भी है जहां पर इस धंधे को शायद आधिकारिक रूप भी प्रदान है. लेकिन इसके परे भी छिटपुट धंधे चलते रहते है. सड़क किनारे खड़ी औरतों से पहले बकायदा सौदा माफ़िक मोलजोल होती है. फिर एक दाम पर सहमति बनती है. ये इकीसवीं सदी है. लोग यहाँ भिखारी को भी बिना गरियाये पैसा नहीं देते. भला गोश्त की मोटरी हो और उसे मुफ्त का पैसा दे. एक अधेड़ व्यक्ति भी किसी कम उम्र की लड़की की चाहत रखता है जिसे आधुनिकता और नशे में चूर कमसीन कली कहता है.

छोटी उम्र के लड़कियों की जीवन यही से नर्क बनना शुरू हो जाती है और अंततः उसे कई बीमारिया अपने प्रभाव जाल से ग्रसित कर मरने पर मजबूर कर देती हैं. इंसान अपने छणिक सुख के लिए उसे ऐसी सज़ा दे जाता हैं. जिसका वो हक़दार नहीं होती. कभी किसी ने जानने कि कोशिश भी नहीं की कि आख़िर वह कौन सी मजबूरी है जो उसे उस दलदल में फसने पर मजबूर करती है. गरीबी, भूख या फिर जिस्म की भूख ? नहीं, कभी नहीं और ये संक्रामक रोग की तरह दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है. उदारहण स्वरूप फिल्मों कहानियों, उपन्यासों के पात्र तो जरूर देखने को मिल जाते है. पर समाधान किंचित ही दिखाई पड़ते. जहाँ इस घिर्णित कार्य में कभी उसे ज़बरदस्ती धकेल देते है तो कभी मजबूरी बन उसके सामने आ जाती है और बार बार अपने जिस्म के चीथड़े कराते हुए इसी को अपना जीवन समझ लेती है.

मैं छिनाल हूँ,

क्योंकि मैंने पैसे ख़ातिर अपना जिस्म बेचा,

इस सभ्य समाज पर मैं धब्बा हूँ,

हर रोज मेरी कीमत लगाई जाती है

चेहरे पर मासूमियत और संस्कार का

नक़ाब लगाए ,शिष्ट लोग मेरे तलवे चाटते हैं

और मैं भी बिना प्रवाह किए अपनी मजबूरियों के

आगे खुद को समर्पण कर देती हूँ,

मैं भी अपने जिस्म की बोली लगा देती हूँ

हाँ मैं छिनाल हूँ।

Mohd Prafull

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