सांप्रदायिक दंगे और भारतीय पुलिस

दिल्ली में हो रहे दंगों ने पुलिस की भूमिका को एक बार फिर कठघरे में ला कर खड़ा कर दिया है। सोशल मीडिया पर कई वीडियोज़ वायरल हो रहे हैं जिसमें न सिर्फ पुलिस दंगाइयों का साथ देते देखी जा रही है बल्कि खुद दंगाई बन गयी है।

आजाद हिन्दुस्तान में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब पुलिस खुद दंगों का हिस्सा बन जाती है। कई कमीशनों की रिपोर्ट इस बात की तस्दीक करती हैं कि पुलिस की भूमिका सांप्रदायिक दंगों के दौरान पक्षपाती होती है।

जहां कई संप्रदाय के लोग एक साथ रहतें हैं वहां सांप्रदायिक हिंसा का होना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन अगर प्रशासन और पुलिस चाहे तो हिंसा पर आसानी से काबू पाया जा सकता है और इसे दंगे की शक्ल अख्तियार करने से रोका जा सकता है। कुल मिलाकर हर हिंसा की रोकथाम पूरी तरह से प्रशासन और पुलिस पर निर्भर होती है।

लेकिन सांप्रदायिक दंगों का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि पुलिस बल कार्रवाई के नाम पर एक विशेष संप्रदाय के लोगों पर सख्ती करती है और दूसरे पक्ष को छूट देती है। जिससे हिंसा बढ़ती है और पुलिस की विश्वसनीयता भी कम हो जाती है।

आकड़ें गवाह हैं कि आधे से ज्यादा दंगों में नुकसान अल्पसंख्यकों का ही होता है उसके बरक्स गिरफ्तारी, तलाशी, और पुलिस फायरिंग और कर्फ्यू  का शिकार भी अल्पसंख्यक ही होतें हैं। पुलिस उसके प्रति ज्यादा कुरूर दिखती है।

इस बात की पुष्टि नेशनल पुलिस कमीशन की छटी रिपोर्ट (मार्च 1981) में भी की गयी है जिसमें इस बात की निशानदेही की गयी कि कई सांप्रदायिक तनाव के मौकों पर पुलिस कई बार एक खास संप्रदाय का ही पक्ष लेती है और दूसरे संप्रदाय के लोगों पर जुल्म ढाती है।

पुलिस की बरबर्रता हमें अंग्रेजों से विरासत में मिली है आज भी पुलिस 1861 के पुलिस एक्ट से कंट्रोल होती है जिसका एक ही मकसद था गुलाम हिन्दुस्तानियों का दमन। पुलिस फोर्स में कोई रिफार्म नहीं हुआ है। पलिस की ट्रेनिंग ऐसी नहीं होती है जिससे इनके अंदर के पक्षपात और  क्रूरता को खत्म किया जा सके।

ऐसे ही खुलासे कई और कमीशनों ने भी किया लेकिन कभी भी पुलिसवालों का ये रवैया राष्ट्रीय चिंता और सुरक्षा का विषय नहीं बना । पुलिस का सबसे बदतरीन चेहरा 2002 के गुजरात और 1984 के दिल्ली फसाद में देखने को मिला।

हिन्दुस्तान में हुए अब तक के सारे बदतरीन फसाद इसकी बोलती तस्वीरें हैं चाहे वह दिल्ली का फसाद हो, भागलपुर का फसाद, बाम्बे का फसाद या फिर गुजरात का फसाद।

इसी तरह पुलिस का जुल्म दंगों के बाद भी जारी रहता है। अधिकतर गिरफ्तारियां मुस्लिमों की ही होती है। इस सिलसिले में ‘लाल बहादुर शास्त्री नेशनल एडमिनस्ट्रेटिव एकेडमी‘ मसूरी का एक अध्ययन बड़ा दिलचस्प है कि मेरठ में 1982 में हुए दंगों के एफ.आई.आर को पुलिस ने दो हिस्सों में तकसीम कर दिया एक में मुस्लिम पर हमले हुए और दूसरे में हिन्दुओं पर हमले हुए जिन एफआईआर में हिन्दुओं पर हमले हुए उनमें 255 लोगों की गिरफ्तारी हुई और जिनमें मुसलमानों पर हमले हुए उनमें एक भी गिरफ्तारी नहीं हुई।

 ये सुनकर ताज्जुब होगा कि एफ.आई.आर में दर्ज मरने वाले में 7 मुस्लिम थें और 2 हिन्दु लेकिन इसके बावजूद पुलिस की कार्रवाई ठीक इसके बरक्स थी जो पुलिस के सांप्रदायिक मानसिकता को उजागर करती है।

सांप्रदायिक दंगा पुलिस के लिए किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं होता है क्योंकि पुलिस लड़ने वाली दोनों संप्रदाय में से किसी एक से संबंध रखती है। ऐसे हालात में पुलिस का अपना फर्ज़ बिना किसी भेदभाव और पक्षपात के निभाना किसी अग्नि परीक्ष से कम नहीं है।

दंगो में पुलिस की भूमिका

तनाव के दौरान शांति स्थापित करना पूरी तरह से पुलिस पर ही निर्भर होता है। यूपी के पूर्व डीजीपी और बुद्धिजीवी डॉ विभूति नारायण रॉय के अनुसार अगर पुलिस चाहे तो कोई भी दंगा 24 घंटे से अधिक समय तक जारी नहीं रह सकता है।

दंगों का न रुकना पुलिस के पक्षपाती होने की दलील है। पुलिस उसी समाज का हिस्सा है जिस समाज को सांप्रदायिकता का विषाणु संक्रमित कर चुका होता है। खाकी पहनकर भी वह पुलिस वाले न होकर केवल एक संप्रदाय विशेष के हो कर रह जातें हैं। 

इसकी सबसे दर्दनाक मिसाल हाशिमपुर का फसाद है जिसमें पी.ए.सी के जवानों ने 40 निर्दोष और निहत्ते मुसलमानों की नृशंष हत्या कर दी और उनके शवों को गज़ियाबाद के निकट नहर में बहा दिया।

डॉ रायॅ उस वक्त गाज़ियाबाद के एस.पी थें उन्होंने जब इस पूरे मामले के तफतीश की और इस अमानवीय कार्य के पीछे की मानसिकता को जानने की कोशिश की तो पता चला की खाकी पहनकर भी वे पुलिसकर्मी न थे, बल्कि एक समुदाय विशेष के होकर रह गयें, मुसलमानों को दुश्मन समझना उनके जेहन में भरा हुआ था जब उन्होंने मुसलमानों की हिन्दुओं पर की जा रही ज्य़ादती की झूटी अफवाह सुनी तो उसे तुरंत सही मान लिया और 40 निर्दोष मुसलमानों की हत्या इसी मानसिकता का रद्दे अमल था।

यही कहानी भागलपुर के लुईआ गांव में भी दोहरायी गयी जब पुलिस और दंगाईयों की मिली भगत से 100 लोगों की हत्या कर दी गयी। यही कहानी बाम्बे में, गुजरात में और अब दिल्ली में भी दोहराई गयी। दंगा से पीड़ित भी एक खास सांप्रदाय ही हुआ और पुलिस से प्रताड़ित भी वही हो रहा है। पुलिस पेशेवाराना तरीके से अपने काम नहीं कर रही है बल्कि वह पक्षपाती हो गयी है।

पुलिस का एक तरफा कार्रवाई

पुलिस का दंगों में कार्रवाई पूरी तरह से पक्षपाती रहा है। जिसकी दास्तान खुद आंकड़े बयान करतें हैं। आकड़ों के अनुसार तलाशी, गिरफ्तारी, फायरिंग, कर्फ्यू हमेशा एक संप्रदाय विशेष के खिलाफ ही होता है।

डॉ विभूति नारायण रॉय के अध्ययन (कम्युनल कोनफिल्कट प्रसेपसन ऑफ पुलिस न्युट्रालिटी डयुरिंग हिन्दु-मुस्लिम राइट्स इन इंडिया, 1998) के अुनसार आधे से ज्यादा दंगों में 70 प्रतिशत मरने वाले अल्पसंख्यक ही होतें हैं कुछ दंगों में इनका नुकसान और अधिक होता है लेकिन इसके बरक्स पुलिस की कार्रवाई अल्पसंख्यक के खिलाफ ही होती है। ज्यादातर पुलिस फाइरिंग में मरने वाले या जेल जाने वाले में अल्पसंख्यक समुदाय के लोग ही होते हैं। चाहे वह बाम्बे का दंगा हो या गुजरात का।

दंगों में संलिप्त पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई

इनकॉइरी कमीशनरों की रिपोर्ट से ये बात साफ है कि दंगो में पुलिस का रवैया पक्षपातपूर्ण और गैरजिम्मेदार होता है। लेकिन इसके बरक्स वो पुलिस अधिकारी जो दंगों में संलिप्त पायें जातें हैं उन पर कभी कोई कार्रवाई नहीं होती है शायद यही वजह है कि देश में खूनी दंगे बदस्तूर जारी है। अधिकारियों की जवाबदेही नहीं होती है।

अब तक जिस सबसे बड़े पुलिस अधिकारी को दंडित किया गया वह एक सब इंस्पेकटर है जिसे भागलपुर फसाद में कथित भूमिका के लिए दंडित किया गया। लेकिन हर फसाद में सियासतदानों के साथ पुलिस भी मज़लूमों के खून में बराबर की शरीक रही है।

1992 के बाम्बे फसाद में आर.डी त्यागी ने 9 निहत्थे मुसलमानों की हत्या कर दी थी। जिसकी निशानदेही श्री कृष्ण कमीशन ने भी की लेकिन इसके बावजूद वह प्रमोशन पाता गया और ज्वाईन्ट कमीशनर के पद तक पहुंच गया।यहां तक कि शिवसेना ने लोकसभा चुनाव का टिकट भी दे दिया।  यू.पी, बिहार, महाराष्ट्र में कभीं भी धर्मनिरपेक्ष पार्टियों ने आरोपी पुलिस अफसरों पर कभी कोई कार्रवाई नहीं की इन्होंने कभी भी किसी भी कमीशन की सिफारिशों पर अमल नहीं किया बल्कि उसे ठंडे बस्ते में डाला और उसका रजनीतिक लाभ उठाया।

पुलिस में सुधार और अल्पसंख्यकों की नुमाइंदगी की ज़रूरत

सांप्रदायिक दंगों में पुलिस द्वारा किया गया कार्रवाई उनके पक्षपाती होने की दलील है जिसकी गवाह खुद उनके द्वारा दिये गयें आकड़ें हैं। इसके अलावा उनकी ये कार्रवाई राजनीति से भी प्रभावित रहती है।

अतः पुलिस में सुधार की आवश्यतकता है जिसकी वकालत कई कमीशनों और बड़े पुलिस अधिकारियों ने भी की है। लेकिन भारत में अभी तक इस दिशा में कोई सार्थक पहल नहीं किया गया है।

कई देशो की पुलिस ने इस हालात से निपटने के लिए उपयुक्त कदम उठायें हैं जिनमें ब्रिटेन और अमेरीका उल्लेखनीय हैं जहां पुलिस फोर्स में अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व को बढ़ाया गया।

वहीं पुलिस की ट्रेनिंग में भी बदलाव किया गया। इसके अलावा पुलिस को जवाबदेह बनाया गया। जिससे बहुत हद दक पुलिस वालों में पक्षपात को कम किया गया। हिन्दुस्तान में पुलिस फोर्स में अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधत्व न मात्र है केवल 4 से 5 प्रतिशत के आसपास है। शायद पुलिस में हो रहे पक्षपात का एक बड़ा कारण है।

 किन्तु हिन्दुस्तान में सबसे पहले तो कोई इस बात को मानने को ही तैयार नहीं है कि पुलिस फोर्स पक्षपाती है जब लोग मर्ज़ को मानने के लिए ही तैयार नहीं हैं तो इसका ईलाज कैसे होगा।

लेखक आफाक हैदर  जामिया मिल्लिया इस्लामिया में रिसर्च स्कॉलर हैं।

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