बदली हैं तो बस बेड़ियां

By Nabeela Shagufi

2018 में एक खबर आई थी जिसमें साउथ कोरिया की महिला एंकर ने चश्मा पहन कर एंकरिंग करनी शुरू की है। साउथ कोरिया में खूबसूरती को प्रोफेशनलिज्म से जोड़ कर देखा जाता है। वहीं हम भारत की बात करें तो एकाध दो डिजिटल चैनलों को छोड़ कर राष्ट्रीय चैनलों में एक भी महिला एंकर चश्मों में नहीं दिखती। वहीं पुरूष एंकर चश्मों में दिखाई देते हैं। चुनावी विश्लेषण हो या चुनावी नतीजे दिखाने हों अमूमन पुरूष एंकर ही नजर आते हैं। समानता की बात करने वाले मीडिया क्षेत्र में ही समानताएं नहीं हैं। राष्ट्रीय हिंदी चैनलों में किसी भी चैनल में महिला हिजाब लगाए हुए एंकरिंग करती नहीं दिखती। जब स्कर्ट पहनना किसी महिला की मर्जी हो सकती है तो हिजाब भी किसी की पसंद हो सकती है पर इसे पितृसत्तात्मकता से जोड़ कर क्यों देखा जाने लगता है ? हिजाब पहने महिला एंकर इसलिए नहीं दिखती क्योंकि वो ग्लैमरस नहीं दिखती। यहां तक कि भारतीय परिधान में भी महिला एंकर्स कभी-कभी ही दिखती हैं।
कपड़ों को अपनी मर्जी से पहनने का मुद्दा अक्सर मीडिया द्वारा उठाया जाता है। सबका अपने देह पर अधिकार है इसलिए अपनी मर्जी से कपड़े पहनने चाहिए। लेकिन बात जब पुरुषों की हो तो वो इस हक से महरूम क्यों हैं ? जब एक महिला स्कर्ट पहनती है तो माॅडर्न और पुरूष बरमूडा पहने ले तो असभ्य कहलाने लगता है। सच्चाई तो ये है कि समानता की बात करने वाले मीडिया क्षेत्र में ही महिलाओं को ग्लैमर से आगे देखा ही नहीं गया। फर्क बस इतना आ गया है कि पहले स्त्री रूढ़िवादिता की बेड़ियों में जकड़ी हुई थी और अब बाजारवाद की बेड़ियों में जकड़ी हुई है।
एक सर्वे के मुताबिक भारत में महिलाओं को पुरुषों की तुलना में 19 प्रतिशत कम वेतन मिलता है। पर इसको लेकर स्वर नहीं उठाए जाते। सोशल मीडिया द्वारा शुरू किए गए एक मुहिम मी टू के जरिए मीडिया इंडस्ट्री से जुड़ी कई महिलाओं ने अपने साथ शोषण की बात कबूली है। कहा जाता है कि बदलाव की शुरूआत अपने घर से करनी चाहिए। ऐसे में जरूरी है कि मीडिया क्षेत्र में भी ये पहल की जाए। महिलाओं को ग्लैमर से आगे भी देखा जाए। किसी महिला के कितने पुरूष मित्र हैं या वो कैसे कपड़े पहनती है ये उसका निजी मामला हो सकता है सशक्तिकरण का पैमाना नहीं। इसे सशक्तिकरण का पैमाना ना बनाकर मीडिया द्वारा मूल मुद्दों पर बात की जाए तो बहुत बदलाव आ सकते हैं पर मीडिया चैनलों के महिला मुद्दे बस कपड़े, शराब, और पुरूष मित्र तक ही सीमित हैं।

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