फायरप्रूफ नहीं है केजरी’वाॅल’ !

by Nabeela Shagufi

दिल्ली हिंसा में अब तक 17 लोगों की जान जा चुकी है। घरों और दुकानें के जलने से आर्थिक नुकसान अलग हैं। लेकिन दिल्ली के मुख्यमंत्री अब तक मीटिंग्स में लगे हुए हैं। पुलिस इस हिंसा को रोकने में नाकाम रही। दोनों तरफ से पत्थरबाजी हुई, गोलियां चलीं। ऐसी वीडियोज भी सामने आईं जिसमें दंगाई पुलिस के सामने ही पत्थर इकट्ठे करते दिखे। लेकिन पुलिस मूकदर्शक बनी तमाशा देखती रही
दिल्ली के चुनावों में केजरीवाल की जीत पर ये कहा गया कि ये नफरत की राजनीति की हार है। पर एक बार फिर राजधानी में नफरत की राजनीति अपने मंसूबों में कामयाब होती दिखी।

केजरीवाल वोट के लिए रोड शो करते हैं, उनकी आवाज दिल्ली के हर नागरिक तक पहुंच जाती है लेकिन जब मुद्दा सुरक्षा हो तो वो अपनी बेबसी जाहिर कर देते हैं। चाहे जामिया में हुई हिंसा हो या जेएनयू हिंसा मुख्यमंत्री ने कुछ ट्विटस करके अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर लिया।
दिल्ली चुनावों में जहां भाजपा ने शाहीनबाग को मुद्दा बनाया वहीं केजरीवाल इससे दूर भागते रहे। और जीत उनकी ही हुई। दिल्ली में महीनों से चल रहे विरोध प्रदर्शनों पर केजरीवाल की खामोशी को राजनीति की इस रणनीति से समझा जा सकता है कि जब मुद्दा मुस्लिम हो तो इसके पक्ष या विरोध में बोलने से अच्छा है कि चुप्पी साध ली जाए। केजरीवाल ने भी यही किया नतीजतन वो चुनाव जीत गए।
दिल्ली हिंसा को लेकर भाजपा को गंभीरता नहीं दिखाने की वजह को समझा जा सकता है क्योंकि उनका एजेंडा हिंसा है और वो आगे बढ़ रहा है। दिल्ली हार चुकी भाजपा इस हिंसा में आगे के चुनावों में जीत की संभावनाएं देख रही और इस हिंसा से वो हिंदू वोट को अपने पक्ष में रखना चाहती है। लेकिन जिन्हें दिल्ली की जनता ने चुना है उन्होंने भी इस हिंसा को रोकने के लिए बयानबाजी के अलावा कोई कदम नहीं उठाए। जब दिल्ली जल रही थी तब देश के प्रधानमंत्री अहमदाबाद में मेहमाननवाजी में लगे थे और केजरीवाल दिल्ली विधानसभा में रामनिवास गोयल को अध्यक्ष चुने जाने पर बधाइयाँ दे रहे थे। कहा जाता है कि हमाम में सब नंगे हैं वैसे ही इस राजनीति के हमाम में भी सब नंगे ही हैं।

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