पहचान का सवाल लोकतंत्र की बुनियादी सवाल है, हिजाब कपड़ा नहीं है बल्कि उसकी पहचान है

भारतीय संविधान की प्रस्तावना की शुरूआत होती है ‘हम भारत के लोग‘। कौन है ये ‘हम‘ ? ये हम से मुराद देश का हर नागरिक है चाहे उसकी पहचान कुछ भी हो। रंग, नस्ल, लिंग, क्षे़त्र और धर्म की पहचान के बुनियाद पर उसके साथ भारतीय गणतंत्र कोई भेदभाव नहीं करता है। हर नागरिक को अधिकार है अपनी पहचान के साथ जीने का और समाज उसी पहचान के साथ उसे स्वीकार करता है। वह समाज में अपने पहचान के साथ भागादारी चाहता है। ये उसका मौलिक और लोंकतांत्रिक अधिकार है, इन्हीं अधिकारों पर लोकतंत्र टिका है। राज्य और समाज उसे बदल कर स्वीकार नहीं कर सकता है। आज पहचान पूरी दुनिया में बड़ा मुददा है। एक औरत फ्रांस में अपनी मुस्लिम पहचान के साथ नहीं रह सकती है। उसके बुर्के और हिजाब पर पाबंदी है। इन्हें इनकी पहचान से डर लगता है और ऐसा नहीं है कि इनकी मुस्लिम पहचान से धर्मनिरपेक्षता खतरे में आजाएगी। बल्कि वह इस पहचान को स्वीकारना नहीं चाहतें हैं। चीन में मुसलमानों को कैंप में रखा जा रहा है क्योंकि वह मुस्लिम पहचान को राज्य की स्वकृति नहीं देना चाहतें हैं।

आज अगर यूजीसी नेट की परीक्षा में मुस्लिम लड़कियों को हिजाब के साथ परीक्षा नहीं देने दिया गया या रोका जाने लगा तो ये सवाल सिर्फ जामिया की छात्रा उमाया खान और गोवा की छात्रा सफीना खान का निजी मामला नहीं है। बल्कि एक समुदाय की पहचान और उसकी अस्मिता का भी प्रश्न है। क्या होता अगर किसी सिख को कहा जाता कि आप अपनी पगड़ी उतार कर परीक्षा दो नहीं तो परीक्षा ही मत दो। क्या वह सबके सामने अपनी पगड़ी को उतारता। ये हर नागरिक का अधिकार है कि वह अपनी धार्मिक पहचान के साथ रहे चाहे किसी सिख भाई की पगड़ी हो या उमाया खान का हिजाब।

आप कह सकतें हैं कि ये गलत है बुर्का और हिजाब दकियानूसी और कठमुल्लापन की निशानी है। लेकिन हर किसी को गलत होने का भी अधिकार है और लोकतंत्र गलत होने का भी अधिकार देता है। चाहे वह फ्रांस की दकियानूस समझी जाने वाली बुर्का पहनने वाली महिला हो या कोई हिजाब लगाने वाली उमाया या सफीना।

लेकिन इस सवाल को भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता कि कुछ लोग इसका गलत फायदा उठातें हैं और कपड़े में छुपाकर चीटिंग करतें हैं। लेकिन परिक्षा में नकल रोकने के और भी तरीकें हैं। कदाचार रोकने के नाम पर किसी के कपड़े उतार देना, किसी की पगड़ी उतार देना, किसी का हिजाब उतरवाना। ये उसकी अस्मिता और भावना को ठेस पहुंचाता है। ये तरीका ठीक नहीं है बल्कि इससे समाज का सबसे हशिये का तबका और हशिये पर चला जाएगा। उमाया खान और सफीना खान का हिजाब सिर्फ किसी परीक्षा के कदाचार से जुड़ा मामला नहीं है बल्कि किसी समुदाय की भावनाओं के खिलाफ लोगों की असंवेदनशीलता को भी दर्शाता है। साथ ही ये पुरूषवादी सामज की मानसिकता को भी दर्शाता है जहां आप किसी लड़की को सबके सामने हिजाब उतारने को कहतें है। आप कैसे ये उम्मीद करतें हैं कि कोई लड़की सारे मर्दों के सामने अपना हिजाब उतार दे। आपकी ये उम्मीद न जाने कितनी उमाया और सफीना को घर की चहार दिवारी में कैद करदेगी। आप हिजाब और बुर्के को महिलाओं की आजादी और सशक्तिकरण से जोड़ कर भी देख सकतें हैं। नहीं तो फ्रांस की तरह पब्लिक स्पेस से जिस तरह मुस्लिम महिलाएं नदारद हो गयीं हमारे स्कूल और कॉलिजों से भी ये मुस्लिम लड़कियां नदारद हो जाएंगीं।

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