तरक्की चाहिए? शिक्षा छोड़ कर देसी कट्टा अपनाएं !

By Nabeela Sagufi

दिल्ली में पाॅल्यूशन थोड़ा थमा ही था कि नेताओं ने आबोहवा में एक अलग तरह का जुबानी जहर घोल दिया है। असल में जिस पाॅल्यूशन ने दिल्ली वालों के नाक में दम कर रखा था वो बेचारा हैरत में है कि इतने जहर के बीच उसका जहर तो असरदार होगा ही नहीं। किसी और शहर का रूख भी किया तो कोई फायदा नहीं है। क्योंकि न्यू इंडिया की आबोहवा ही ऐसी है जितना ज्यादा जहर उगलोगे उतने ही ज्यादा देशभक्त माने जाओगे इसलिए तो कोई प्रदर्शनकारियों द्वारा रेप किए जाने की बात करता है तो कोई गोली मारने की बात करता है।

इधर नेता गोली मारने की बात करते हैं उधर देशभक्त युवक गोली मार देता है। अर्थव्यवस्था लचर है, अच्छे दिनों की रफ्तार भले ही कम हो पर धन्य है कि हमारे देश में ऐसे देशभक्त युवक जिंदा हैं जो मुंह से बात निकलते ही अंजाम दे देते हैं। अब इससे ज्यादा क्या विकास चाहिए ? तरक्की सिर्फ देशभक्त युवाओं को ही क्यों मिले दिल्ली पुलिस ने भी राष्ट्र-हित में बहुत काम किए हैं बिना इजाज़त जान नहीं बचाई है लेकिन देश के गद्दारों पर धुआंधार लाठियां बरसाई हैं। ये देश के गद्दार तिरंगा लिए हुए गांधी के रास्ते अपनाना चाहते हैं। क्या इन्होंने गोडसे की देशभक्ति की गाथा नहीं सुनी है? इन गद्दारों की जान लेने से तो तरक्की मिलेगी इसलिए जहां मौका मिला धुआंधार लाठियां बरसा दीं। देशभक्ति का सबूत देने के लिए के कुछ जानें ले ही लीं तो क्या?

इधर एक अन्य नेता ने गद्दारों को बिरयानी खिलाने की बात करके राष्ट्र के विरुद्ध बातें कर दीं। बिरयानी मुगलों की शान हुआ करती थी और किसी राष्ट्रवादी के मुंह से ये बातें शोभा नहीं देतीं कि वो मुगलई खानों का नाम लेकर उनकी ख्याति बढ़ाए। अरे बोलना ही था तो ‘इनके’ जैसे किसी संबोधन का इस्तेमाल कर लेते या मीठे चावलों की खीर की बात कर लेते, जो किसी देशभक्त द्वारा गद्दार को गोली मारने पर बांटी जाती है। देश में जिन मसलों पर 70 सालों में चर्चा नहीं हुई उन मसलों पर गंभीरता से चर्चा हो रही। किसी भी नेता को ये फिक्र नहीं हुई थी कि राष्ट्रहित के लिए शिक्षण संस्थानों पर ताले डाल दें। पढ़ने-लिखने से बच्चे राष्ट्र विरोधी बातें करने लग जाते हैं सो सभी शिक्षण संस्थान पर जल्द से जल्द ताले डाल दिए जाने चाहिए। और वैसे भी पढ़ने लिखने में दिमाग भी खपाना पड़ता है और कुछ बोलने पर लाठी डंडे भी पड़ जाते हैं।

इन सबके बावजूद पढ़ भी लिया तो क्या? नौकरी के लिए दर दर की ठोकरें खानी पड़ती हैं। इन सब से अच्छा है छात्र पढ़ाई छोड़ कर बंदूक, लाठियां चलाना सीख जाएं। किसी पार्टी के टिकट तो मिल ही जाएंगे साथ ही सम्मानित भी किया जाएगा। वहीं दूसरी तरफ धर्म खतरे में था पर जनता हाय महंगाई करती रहते थी। सब सिर्फ अपने बारे में ही सोचते थे। धर्म की कोई चिंता ही नहीं थी। अब देखो धर्म की चिंता करते ही महंगाई किसी कोने में सिकुड़ी पड़ी सोच में है कि सीएए-एनआरसी की बला टले तो उस पर गौर व फिक्र किया जाए। देश के नागरिक भी ऐसे हैं जो अपने पुरखों के दस्तावेज संभाल कर नहीं रख सकते। भ्रष्टाचार तो नेताओं के सर का ताज हुआ करता है। सरकारी कामों के दस्तावेज भले ही खो जाएं जनता को तो जागरूक होना चाहिए।

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