किसपर भरोसा करें: कोर्ट, पुलिस, सरकार या नाकारा विपक्ष

अरशद मिसाल

हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी बीजेपी के उन नेताओं पर एफआईआर दर्ज नहीं होती है, उल्टा जस्टिस एस मुरलीधर का तबादला कर दिया जाता है जिन्होंने पुलिस को फटकार लगाई थी। अगले दिन दूसरे जजो के समक्ष इस मामले की सुनवाई हुई और इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। इसपर अब अगली सुनवाई 4 सप्ताह बाद होगी।

वहीं अगले ही दिन पूरे मामले को एक नया रूप दे दिया गया, मुस्तफाबाद के स्थानीय पार्सद ताहिर हुसैन का मीडिया ट्रायल शुरू हो गया। क्योंकि उनके छत पर पत्थर और पेट्रोल मिले हैं। जिस दिन हिंसा हुई, ताहिर एक वीडियो बना कर न्यूज चैनलों में भेजते है। उसमे वह बताते हैं कि उनके घर को घेर लिया गया है, चारों तरफ आग़ दिख रही है। वह बताते हैं की पुलिस को कई बार कॉल करने के बाद भी कोई फोर्स नहीं आई। उन्होंने कई अधिकारियों के पास कॉल किया कोई उत्तर नहीं मिला। उन्होंने कॉल रिकॉर्डिंग भी दिखाई और सुनवाई जिसमें वह पुलिस को अपने मुहल्ले की जानकारी देते हुए दिख रहे हैं। वह यह बताते हुए दिख रहें है कि दंगाई उनके घर को घेर लिए हैं और दरवाज़ा तक तोड़ दिया है। लेकिन इन सब के बावजूद उन्हें विलेन बना कर मीडिया दिखाने लगती है । फिर कोर्ट के आदेश के बाद जिन बीजेपी नेताओं पर पुलिस FIR नहीं कर पाती है वही पुलिस ताहिर पर फौरन FIR दर्ज कर लेती है।

क्या दिल्ली पुलिस भरोसे के लायक है? मेरे अनुसार बिल्कुल नहीं, जेएनयू, जामिया, और इस दंगे में उसकी भूमिका को देखते हुए बिल्कुल नहीं। कई वीडियो में पुलिस प्रदर्शनकारियों के साथ पत्थर चलाती हुई दिख रही है, इंडिया टुडे के पत्रकार राजदीप सरदेसाई दंगा प्रभावित इलाके में गएं, वहां उन्होंने भूरे खान से बात की जिन्होंने अपनी आपबीती बताई और साथ यह बताया कि मेरे घर को आग लगाने वालों के साथ पुलिस भी थी, मैंने वीडियो भी बनाया है लेकिन मोबाइल गिर गया, मोबाइल मिलने के बाद वीडियो भी बाहर आएगा। क्या यह सुनने और देखने के बाद आप पुलिस पर भरोसा करेंगे?

मीडिया और पुलिस के बाद अब न्यायपालिका की भूमिका पर आते है। पिछले कुछ सालों से न्यायपालिका बिल्कुल निष्पक्ष नहीं दिख रही है या फिर यह भी सकता है मै न देख पा रहा हूं। सुप्रीम कोर्ट के 4 जज बाहर आकर अपना दुखड़ा कुछ दिनों पहले मीडिया के सामने सुनाया था। आप बाबरी मस्जिद मामले को देख लिजिए या जामिया हिंसा के बाद कोर्ट की भूमिका देख लीजिए। लेकिन अभी भी कुछ मुरलीधर जैसे ईमानदार जज है लेकिन उनके साथ यह सरकार क्या कर रही है आप खुद देख लीजिए। वैसे यह इतिहास रहा है, सरकार किसी की हो, ईमानदार अधिकारियों को इनाम के तौर पर सिर्फ तबादला ही मिलता है। न्यायपालिका भी खुद को राजनीति से बचाने में नाकाम रही है।

केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार और विपक्ष से क्या उम्मीदें करना चाहिए? बिना सरकार के सहमति से यह दंगा तीन दिनों तक नहीं चल सकता था। दिल्ली के मुख्यमंत्री की खामोशी सबको चौंकाता है, जो इंसान सरकार बनने से पहले सबको पर रहता और सोता था आज वह अपने एसी कमरों से निकलने से परहेज़ करता है। जब रात में जामिया से कुछ छात्र उनसे मिलने जाते है तो मुख्यमंत्री साहब मिलने के बजाए उनपर लाठिया और पानी की बौछारें चलवाते हैं। जो पानी उन छात्रों और लोगों पर चलाई गई अगर वह दंगा ग्रसित इलाकों में चलवाया गया होता तो शायद दो चार दुकानों/घरों को बचाया जा सकता था। कांग्रेस भी खुलकर सामने नहीं है, बस रश्म- आदाएगी की। दंगे के बाद उन इलाकों में जाते हैं देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल, जिनका काम राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना है, वह उन गलियों को सैकड़ों अंगरक्षकों के साथ दिखते है, भरोसा दिलाते दिखते हैं, अच्छी बात है। लेकिन सवाल यह है कि यह किसका काम था, जनता के मंत्री, सांसद और विधायक कहां थे।

मै उन सभी इंसानों को सलाम करता हूं, जिन्होंने इंसानों को बचाया। हिन्दुओं ने मुसलमानों को बचाया और मुसलमानों में हिन्दुओं को। इस दंगे में हैवान, इंसानियत का कत्ल करते रहें और सरकार देखती रही वह भी देश की राजधानी में। एक बात समझ ले दंगों से किसी का कोई फायदा नहीं होता, और होता है तो सिर्फ नुकसान, किसी का कम तो किसी का ज्यादा। जहां तक मुझे लगता है यह दंगा सिर्फ और सिर्फ चल रहे प्रोटेस्ट को ख़तम करवाने के लिए कराया गया है।

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